Friday, 31 August 2012

shankarshah kuwar raghunath shah maravi

गोंडवाना साम्राज्य गढ़ा जबलपुर  भारत में पैर परसाने वाले अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने की पूरी योजना बना ली गई और राज महल से सभी सैनिकों को गुप्त तामीली दी गई कि 52 गढ़ गोंडवाना साम्राज्य भारत भूमि से अंग्रेजी ताकत को नस्तानबूत करना है। पूरी ताकत के साथ लड़ाई होगी अंग्रेजों को गोंडवाना के वीर सपूतों की ताकत को दिखाना अब अनिवार्य हो गया है। बावनगढ़ गोंडवाना साम्राज्य के अंतिम शासक महाराजा शंकरशाह मरावी ने अपने पुत्र युवराज रघुनाथशाह मरावी को उक्त संदेश दिया और युवराज रघुनाथशाह मरावी से कहा कि कपटी अंग्रेज हमारे भारत भूमि में व्यापार करने के उद्देश्य से आये और देश की बागडोर अपने हाथ में लेकर धर्म संस्कृति को नष्ट कर ईसाई मिशनरियों में जबरदस्त शामिल कर रहे है। देश, धर्म पर हमला हो रहा है। भारत इस अन्याय को अब बर्दाश्त नहीं करेगा। यह युद्ध हमारे लिये महत्वपूर्ण है। इस युद्ध में हम मर भी जाये तो हमें गर्व होगा, हम अपने देश मातृभूमि की रक्षा में समर्पित है। हमारे प्राण हमारे देश की सुरक्षा में काम आये, हम भारत की रक्षा में हर कदम आगे रहेंगे। पिता की बात को सुनकर युवराज रघुनाथशाह मरावी गद-गद हो गये और अपने राज्य के सैनिकों को बुलाकर कहा कि हमें महाराज ने हुक्म दिया है हम अपने वतन भारतभूमि के सुरक्षा के लिए तैयार हो जाये। अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेडऩा हमारा परम कर्तव्य और धर्म है। अंग्रेज व्यापारी नहीं अंग्रेजी कोई कंपनी नहीं बल्कि ये भोले-भाले गरीब लोगों को लोभ देकर पादरियों के माध्यम से इसाई बना रहे है। भारत की सम्पत्ति को लूट कर विदेशों में जमा कर रहे है और समृद्धशाली संस्कृति के लिए अंग्रेजों के विरूद्ध में नारे लगाये और कहा अंग्रेजों भारत से वापस जाओ इसी में भला है, वर्ना हम तुम्हे मसल देंगे हम भारत के लाल है। सेवा-जौहार, सेवा जौहार।। राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह मरावी भारत स्वतंत्रता संग्रेाम के लिए महासंग्राम की शुरूआत किया। इतिहास के पन्नें में इन शहीदों का नाम का जिक्र नहीं है। इतिहासकार लेखक शायद इतिहास के पन्नों में इनका वर्णन नहीं किया हो एक अलग बात है वैसे भी गोंडवाना संस्कृति और इतिहास को कौन लिखता है जो गोंडवाना का इतिहास लिखता था उसे मार दिया जाता था और उसके द्वारा रचित साहित्य को भी जला दिये जाते थे। गोंडवाना साम्राज्य के कहानी, लेख इतिहास के पन्नों में नहीं पर उसके किला महल धरोहर साक्षी बतौर सिर उंचा किये खड़े है। अपने-अपने वंशजों रखवालों की बाट जोह रहे हो प्रतीत होता है। बहरहाल खोज का विषय है। गोंडी शब्द में अनेक राजाओं का कहानी किस्से सुनाई देती है और वही कहानियों को आधार मानकर किलो महलों को साक्षी मानकर गोंडो की बाहुल्य संख्या को प्रतिपादित कर सच का आईना इतिहासकारों के सामने रखा जा रहा है। जिससे अतीत का वैभवशाली गोंडवाना साम्राज्य को इतिहास के पन्नों में स्थान मिल सके और गोंडवाना साम्राज्य की कहानी वर्तमान में आध्ुाुनिक युग में जीवन बसर करने वाले लोगों को जानकारी हासिल हो सके। इस देश का मूल निवासी समाज बहुत दयालु है। इस बात को आर्यो ने भली भॉंती समझा और उनकी ईमानदारी को पैरों तले रौंदा जिससे आज अपनी पहचान खोने जा रहे गोंड समुदाय के लोग अपनी जाति को सरकार को बताने के लिए अब 50 साल का रिकार्ड साक्षी बतौर प्रस्तुत कर रहे है। जाति, धर्म से उपर उठकर देशहित में अपने प्राण त्यागने वाले शहीदों को अगर यह बात पता चलता कि जिस भारत भूमि को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिए प्राणों की बलि दी और आज उन्हीं के वंशज अपने जाति को बताने के लिए 50 साल का रिकार्ड प्रस्तुत करना पड़ रहा है। आखिर इतना भेदभाव क्यों ? आज स्वतंत्र भारत में उंच-नीच, वर्ण-भेद भले बरकरार हो जो लोग इन कुरूतियों को गरीब भोले-भाले किसान मजदूरों के उपर थोप रहे है। कभी न कभी इसका गंभीर परिणाम भुगतेंगे, उंचनीच भेदभाव वर्ण व्यवस्था, धर्म व्यवस्था, मानव जीवन के लिये घातक है, जिस प्रेमभाव और इंसानियत के लिये बदनियत, हैवानियत दोगले अंग्रेजों के विरूद्ध महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह मरावी ने 1857 की भारत स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हो गये उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि भारत से अंग्रेजों के चले जाने के बाद मूल निवासियों पर जुल्म होगा। आज राजा शंकरशाह मरावी, रघुनाथशाह का बलिदान इतिहास के पन्नों पर स्थान नहीं मिला इसे दुर्भाग्य ही कहा जाये। आज हम उनकी शहादत को याद कर रहे है, आज उनके बलिदान को गौरवशाली इतिहास बनाने के लिये आगे आ रहे है, आज किसी एकलव्य का अंगूठा फिर से नहीं कटेगा। लेखनी लिखने वालों को किसी तोप से नहीं उड़ाया जायेगा। कलम की शक्तिपुंज से शहीदों की शहादत की लेखनी हमेशा अमरकृति होगी जो जनमानस के ह्दय में हमेशा-हमेशा के लिये विराजमान होगा। 18 सितम्बर 1857 वह दिन हमारे लिये दुर्भाग्य का दिन था जब अंग्रेज हंस रहे थे। भारतवासी फूट-फूट कर रो रहे थे। 52 वीं रेजीमेंट के सैनिकों में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी थी। महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जंग का ऐलान हुआ। नाकाबंदी, घेराबंदी अंग्रेजों के आने-जाने के सभी रास्तों पर सैनिकों की तैनाती का गोपनीय बातें अंग्रेजों तक पहुंच गई। अंग्रेजी अपनी आधुनिक हत्यारों से राजा के सैनिकों पर हमला बोल दिया। युद्ध हुआ, अंग्रेजों ने महाराजा शंकरशाह औश्र कुंवर रघुनाथ को घेर लिया फिर भी कई दिनों तक दोनों पितापुत्र को नहीं पकड़ पा रहे थे। घने जंगल पुरवा गांव में राजा अपने बेटे के साथ अंग्रेजों को मारने की योजना बनाने लगे। राजा पुरवा में है सूचना डिप्टी कमिश्रर क्लार्क को मिली। अंग्रेजी सैनिक क्लार्क को यह संदेश किया कि महाराजा शंकरशाह बहुत शक्तिशाली है। इसे जिन्दा पकडऩा बड़ी मुश्किल है। डिप्टी कमिश्रर क्लार्क ने दो दर्जन से ज्यादा सवारी और भारी मात्रा में पुलिस के सिपाहियों को लेकर 14 सितम्बर 1857 को महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह मरावी को गिरफ्तार करने पुरवा पहुंचे। भारी मात्रा में सिपाही पुरवा ग्राम को आसपास से घेर लिया। डिप्टी कमिश्रर ने राजा शंकरशाह को कहा कि हम आपसे युद्ध करने नहीं बल्कि समझौता करने आये है आप हम एक साथ बैठकर चर्चा करेंगे। आपके राज्य में हम दखल नहीं देंगे। राजा ने अंग्रेज की चिकनी-चुपड़ी बात पर विश्वास कर लिया। शंकरशाह एवं रघुनाथशाह मरावी एवं 13 साथियों ने जैसे ही डिप्टी कमिश्रर के पास पहुंचे तब धोखे से उनके सिपाहियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सिपाहियों ने राजा के निवास की तलाशी ली। उन्हें क्रांति संगठन के संबंध में कई दस्तावेज मिले। उन दस्तावेजों में शंकरशाह द्वारा लिखित एक कविता भी लगी जो राजा ने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने तथा अपना राज्य स्थापित करने के लिए अपनी आराध्य देवी को संबोधित कर लिखी थी। वह कविता थी - 
मूंद मुख डंडिन को चुगलौं को चबाई खाइ,
खूंद दौड़ दुष्टन को शत्रु-संहारिका। 
मार अंगरेज, रेज, कर देई मात चंडी । 
बचे नहिं बैरि, बाल बच्चे संघरिका ।।
संकट की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर,
दीन की सुन आय मात कालिका। 
खायइ लेइ मलेछन को, झैल नहिं करौ अब, 
भच्छन कर तत्छन धौर मात कालिका ।। 
इसी तरह की कविता उनके बेटे रघुनाथशाह की हस्तलिपि में थी। दोनों को सैनिक जेल में रखा गया। राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह की गिरफ्तारी से 52 वीं रेजीमेंट के सैनिकों में आक्रोश बढ़ गया। उन्होंने राजा को जेल से मुक्त कराने का पूर्ण प्रयास किया परंतु वे सफल न हो सके। अंग्रेज जानते थे कि शहरशाह की आजादी क्रांतिकारियों को एकत्र कर देगी। इसलिए उन्होंने तत्काल डिप्टी कमिशनर और दो ब्रिटिश अधिकारियों की एक सैनिक अदालत बैठाई। अंग्रेजों की सैनिक अदालत का न्याय एक नाटक था। अदालत ने भीषण देशद्रोह रूपी कविता लिखने और कार्य करने के अपराध में राजा और उनके पुत्र को मृत्युदण्ड की सजा सुना दी। विश्व के इतिहास में साहित्य सृजन पर ऐसा अमानवीय अत्याचार कम ही देखने में आता है। 18 सितम्बर 1857 को जबलपुर में एजेंसी हाउस के सामने फांसी परेड हुई। एजेंसी हाउस के अहाते में दो तोपें लाई गई। इसक ेबाद राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह को जेल से लाया गया। उनके चेहरों में दृढ़ता झलक रही थी। राजा को देखने के लिए अपार जनसमूह का सैलाब उमड़ पड़ा। सैनिक उत्तेजित भीड़ को संयमित कर रहे थे। शंकरशाह तथा रघुनाथशाह की हथकडिय़ां और बेडिय़ां निकाल कर उन्हें तोप के मुंह पर बांध दिया गया। तोप के मुंह पर बांधे जाने के समय शंकरशाह ने प्रार्थना की कि देवी उसके बच्चों की रक्षा करें जिससे कि वे अंग्रेजों से बदला ले सकें। शीघ्र ही तोपचियों को तोप दागने की अज्ञा दी गई। तोप चलाते ही पिता-पुत्र के अंग क्षत-विक्षत होकर चारों ओर बिखर गये। 
घटनास्थल पर उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी ने इस घटना का वृतांत दिया - वृद्ध का चेहरा शांत और दृढ़ था (इसके पूर्व भी वह अचल रहा) इसी तरह का भाव उसके 40 वर्षीय पुत्र के चेहरे पर भी था। उनके पैर और हाथ तोपों के निकट ही गिरे- क्योंकि वे बंधे हुए थे। सिर और शरीर के उपरी भाग सामने की ओर 50 फुट की दूरी तक बिखर गये। उनके चेहरों को जरा भी क्षति नहीं पहुंची थी। उनकी गरिमा अक्षुण्ण रही। 
रानी ने अधजले अवशेष एकत्र कर उनके अंतिम संस्कार विधिवत पूर्ण किये। अंग्रेज शंकरशाह-रघुनाथशाह की तोप से उड़ा क्रांति की की चिंगारी बुझाना चाहते थे। लेकिन वह चिंगारी बुझी नहीं और धधक उठी। 52 वीं रेजीमेंट के सैनिक उसी रात क्रांति की राह पर चल पड़े। इस तरह शंकरशाह ने गढ़ा-मंडला की गौरवशाली बलिदानी परंपरा में एक और अध्याय जोड़ दिया। लगभग 300 वर्ष पूर्व गोंड वंश की वीरांगना ने भी मुगल साम्राज्य के विरूद्ध हथियार उठाया था। गोंड की स्वाधीनता की रक्षा के लिये रानी दुर्गावती ने रणभूमि में प्राण न्यौछावर किये थे। उनके वंशजों ने भी उसी बलिदानी परंपरा का निर्वाह किया। 
आज पूरे देशवासियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बनकर रह गये है। एक ओर जहां इनकी शहादत को प्रतिवर्ष याद किया जाता है वहीं सरकार की ओर से इन शहीदों का नाम इतिहास के पन्नों पर ना लाकर आदिवासी वर्ग के क्रांतिकारियों के नाम को शायद इतिहास के पन्नों से मिटा देने की मंशा रही होगी। यह साफ स्पष्ट है कि भारत स्वतंत्रता संग्राम के जनक आदिवासियों को ही कहा जाता है और शुरूआत भी आदिवासियों ने ही किया था। बाहरी ताकतों का विरोध करने में और हथियारों से लडऩे में माहिर क्रांतिकारियों का नाम और उनके द्वारा किए गए देशहित के कार्यो का इतिहास के पन्नों पर ढूंढने पर भी नहीं मिलता है। आज गोंडवाना समुदाय के लोगों को खुद के इतिहास को खुद को लिखना होगा और जो गोंडवाना की आन, बान, सम्मान के लिए शहीद हो गये उनकी शहादत व्यर्थ न जाय इसके लिए हर दिन हर वर्ष उनकी कुर्बानी को याद का देश निर्माण में लगा देना चाहिए। इसी प्रकार बहुत से वीर महापुरूष हुए जिनका नाम सरकार ने कभी इतिहास के पन्नों में लाने की कोशिश नहीं की। वे इस प्रकार है - 1765 - छोटानागपुर में संथाल परगना का ब्रिटिश राज में अधिग्रहण
1772-80 - पहाडिय़ा विद्रोह
1780-85 - तिलका माँझी के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना से 
सफल मुकाबला
1785 - तिलका माँझी को तमाड़ विद्रोह के सिलसिले में भागलपुर 
कारागार में फाँसी की सजा
1795-1800 - तमाड़ विद्रोह
1797 - विष्णु मानकी के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह
1798 - वीरभूम बाँकुड़ा में मानभूम का चौर विद्रोह
1798-99 - मानभूम का भूमिज विद्रोह
1800-02 - तमाड़ के दुखन मानकी के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह
1819-20 - भूकन सिंह के नेतृत्व में पलामू में मुंडा विद्रोह
1832-33 - खेरवाड़ विद्रोह
1833-34 - वीरभूम के गंगानारायण सिंह के नेतृत्व में भूमिज विद्रोह
1855 - लॉर्ड कार्नवालिस के खिलाफ़ संथाल विद्रोह
1855-60 - सिद्धू कान्हू विद्रोह
1874-99 - बिरसा मुंडा का आंदोलन
1874 - भागीरथ माँझी का खैरवाड़ विद्रोह
1912 - बिहार का विभाजन छोटानागपुर का बंगाल में विलय
1913 - छोटानागपुर उन्नति समाज का गठन
1914 - तानाभगत का आंदोलन

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gondi bhasha darpan
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september 2012





Sunday, 26 August 2012

gondi bhshsa darpan



  1. सृष्टि रचना और मानव  जन्म के उपरांत उनके परस्पर मिलन और संवाद के लिए भाषा की आवश्यकता हुई। पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में निवास करने वाले जनसमुदाय के द्वारा बोली वाली भाषाओं का जन्म हुआ और मनुष्य परस्पर एक-दूसरे से संवाद बनाने के लिए  बोलाी,भाषा क उपयोग करने लगे। भारत में बोली जाने वाली अनेक भाषायें है। जिनमें से 22 भाषाओं को भारत के संविधान की 8 वीं अनुसूचि में शामिल किया गया है एवं भारत की जनगणना वर्ष 2001 मेंभारत मे  बोली जाने वाली ऐसी 100 भाषाओं को सूचिबद्ध किया गया है। यह सच है कि मनुष्य के संपूर्ण विकास के लिए देश में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं का उपयोग सरकारी काम काज  पर उपयोग नहीं होने की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों की भाषा को आसानी से समझना कठिन होता है। आज पूरे देश में प्रतिदिन गोंडी बोलने वालों की संख्या 27 लाख 13 हजार 790 से भी अधिक है और गोंडी बोलने वालों की संख्या में पूरे देश में काफी तादाद में है। गोंडी भाषा को शासनस्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं होने की वजह से गोंडी बोलने वाले जनसमुदाय का विकास काफी हद तक रूका हुआ है। आज महत्ती जरूरत है कि गोंडी भाषा को भारतीय संविधान की 8 वीं अनुसूची में सम्मिलित कर मान्यता दिया जाए। आज संपूर्ण विश्व में अंग्रेजी भाषा में व्यापार का संचालन हो रहा है। जिस व्यक्ति को अंग्रेजी भाषा के साथ अन्य भाषाओं का ज्ञान है तो वह व्यक्ति विश्व में कही भी अपना कारोबार चलाकर भविष्य निर्माण कर सकता है। भारत की राजकाज की भाषा हिन्दी है हिन्दी भाषा का ज्ञान भी वर्तमान समय मे अनिवार्य है और प्रत्येक भारतीय हिन्दी के विकास में अपना सहयोग दे सकता है। प्राचीन काल की भाषा गोंडी है । कहा जाता है की गोंडी भाषा का जन्म मानव जन्म के साथ हुआ है। प्राचीन भूभाग  गोंडवाना लैंड में निवासरत गोंडी बोलने वालों की संपूर्ण विकास के लिए गोंडी भाषा की मान्यता अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति के विकास में भाषा का महत्वपूर्ण दायित्व होने के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के भाषाओं का सम्मान का अधिकार संविधान में उल्लेखीत किया गया है और प्रत्येक व्यक्ति और उसके भाषा के सम्मान को देखते हुए  उनके द्वारा बोलने वाले भाषा और बोलने वालों की संख्या की गणना कर उनकी समुचित विकास हेतु भाषा की मान्यता अनिवार्य हो जाती है। आज का नई पीढि़ की पहली पसंदीदा भाषा अंग्रेजी है और हिन्दी है अंग्रेजी भाषा प्रत्येक व्यक्ति के लिए आज अनिवार्य हो गया है। जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है वह अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं। यह सत्य है कि जिन्होंने अंग्रेजी से पढ़ाई-लिखाई किया है वह आज सरकारी स्तर के नौकरियों में उच्च पदों पर पदासीन है और जो लोग अंग्रेजी भाषा का अनुसरण नहंी कर पाए है उन्हें स्वयं के आर्थिक विकास में कठिनाईयाँ झेलना पड़ रहा है। आज जरूरत है अंग्रेजी,हिन्दी और गोंडी एवं अन्य भाषाओं  को जानने और सीखने के लिये जिससे    प्रत्येक व्यक्ति भाषा के माध्यम से एक दूसरें की  बीच संवाद स्थापित कर सकता है।

       darbu singha uikey      



                   गोंडी भाषा दर्पण पत्रिका का उद्देश्य गोंडी भाषा को जन-जन तक पहुंचाना


देश में हिन्दी, अंग्रेजी समेत कई भाषाओं का प्रचार-प्रसार तेजी से चल रहा है। इन्डोयूरोपियन, जर्मनिक, इन्डोआर्यन, इरानियन, अस्ट्रो-एशियाटिक, तिब्बतो बुर्मेस आदि भाषाओं का भारत में जोर-शोर से प्रचार-प्रसार हुआ और लोगों का झुकान इन्डोयूरोपियन, जर्मनिक भाषाओं की ओर हुआ है। आज देशी नस्ल के लोगों की द्रविडय़न भाषा प्राय: लुप्त होने के कगार पर खड़े है। अगर पिछले इतिहास को देखा जाए तो  लगभग 1600 ईसवी सन में अंग्रेजों ने इस्ट इंडिया कंपनी के रूप में भारत में व्यापार करने के उद्देश से आये और उन्होंने अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार किया। आज हर आदमी अपने आप को अंग्रेजी का सुपरमैन बनाना चाहता है, और आज भारत में एक आम धारणा यह बन गई है कि जिसे अंग्रेजी भाषा अच्छी ज्ञान है उसे लोग बड़े ही सम्मान के साथ देखते है, और कहते है कि इसकी इंग्लिश अच्छी है। वहीं भारत में ऐसे बहुत लोग है जो अपने बच्चों को हिन्दी मीडियम में शिक्षा न दिलाकर अंग्रेजी माध्यम पढ़ाना उचित समझते है और आम आदमी की धारणा भी अंग्रेजी की ओर झुकता नजर आ रहा है। यहां तक कि सरकार भी अंग्रेजी के सामने घुटना टेक दी। म.प्र. सरकार विगत 5 वर्ष पूर्व मे सरकारी स्कूलों में भी हिन्दी के एक-दो-तीन को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया गया है। ताज्जुब तो जब होती है जब बच्चे अंग्रेजी के वन को एक कहते है और हिन्दी के एक से अनभिज्ञ रहते है। क्या आने वाले समय में अंग्रेजी भाषा पूरे विश्व में अपना पैर पसार लेगा। क्या अंग्रेजी के सामने सभी भाषाए अपने आप को गुलाम बना लेगी? हमने बालाघाट जिले के एक छोटा सा गांव दुरेन्दा के एक बुजुर्ग से इस संबंध में चर्चा किया और कहा कि गोंडी भाषा का अस्तित्व अब विलुप्त हो जाएगा। इसके लिए हमें आगे आने की जरूरत होगी। बुजुर्ग ने जवाब देते हुए स्पष्ट कहा कि गोंडी भाषा  लुप्त का कारण पढ़े-लिखे और नौकरी वाले लोगों का सबसे अहम भूमिका रही है। अब पढ़े-लिखे और नौकरी वाले लोग ही इस भाषा को प्रचार-प्रसार कर बचाने की कोशिश कर सकते है। बुजुर्ग ने यह भी कहा कि जब अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी है,हिन्दुओं की भाषा हिन्दी है तो आदिवासियों की भाषा क्या है? इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। जब वर्षो पूर्व इस भूभाग में गोंडवाना साम्राज्य का  संचालन हुआ करता था तब इस गोंडवाना साम्राज्य की भाषा गोंडी हुआ करती थी, किन्तु आज गोंडी भाषा अपने अस्तित्व के लिए ही संघर्ष कर रही है। बुजुर्ग ने यह भी कहा कि आज गोंडवाना और गोंडी संस्कृति की बात नहीं हो रही है। गोंडवाना और गोंडी संस्कृति का रहस्य केवल गोंडी भाषा में ही प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु गोंडवाना और गोंडी संस्कृति को पढ़े लिखे लोगों ने पूरी तरह से अपने जीगर में दफनाकर नई नाम आदिवासी और आदिवासी संस्कृति दिया गया है किन्तु प्रश्र यह उठता है कि इस देश का प्राचीन निवासी आदिवासी है तो उसकी भाषा क्या है ? प्राचीन आदिवासियों की कोई न कोई भाषा तो रही होगी और उस भाषा से उस संस्कृति का ज्ञान हो सकता है। जैसे अंग्रेजी से अंग्रेजों का हिन्दी से हिन्दूओं का, गोंडी से गोंडवाना का तो आदिवासियों की संस्कृति की जानकारी किस भाषा से मिलेगी?
बुजुर्ग के द्वारा की गई प्रश्रों पर अगर हम गहराई में जाते है तो हमारे सामने ढ़ेर सारे सवाल खड़े होते है जैसे डॉ. सुरेश मिश्र के द्वारा गढ़ा के गोंड राज्य पुस्तक लिखी गई है। उसमें कई हजारों त्रुटियॉं की गई है। उक्त पुस्तक वेद-पुराणों को आधार मानकर लिखी गई है। अगर गोंडी भाषा को आधार मानकर लिखी जाती तो गोंड राजाओं की वास्तविकता का पता चल सकता था। डॉ. मिश्र ने 8 वीं शताब्दी के गोंड राजा का नाम सुरतानसिंह को सुलतान बनाने की कोशिश किया है जो कि उनका मंदबुद्धि का परिचय हो सकता है। जबकि सुरतान शब्द गोंडी है और 8 वीं शताब्दी में गोंडवाना साम्राज्य अस्तित्व में था गोंडवाना साम्राज्य की भाषा गोंडी थी और उस गोंड राजा का नाम सुरतान था। 8 वीं शताब्दी में गोंडवाना साम्राज्य में राज करने वाले राजाओं में से एक राजा जिनका नाम सुरतान था। जिसको ज्ञान होता है जिसके बारे में उसे पता होता है उसे गोंडी में सुरतान कहते है  जैसे नाकुन तैना सुरतान, हिल्लैट अर्थात इसका ज्ञान मेरे को नहीं है। तैना सुरतान नन वेहका- मै इसके बारे में बताउंगा। राजा सुरतानसिंह राज्य के बारे में सब कुछ जानते थे किन्तु राजा सुरतानसिंह के नाम को परिवर्तन करने का प्रयास गढ़ा गोंड राज्य के लेखक डॉ. सुरेश मिश्र ने किया जो काल्पनिक है और वास्तविक तो यह है कि गोंडवाना भूभाग में गोंडो का बाहुल्य निवास होना ही गोंडवाना का परिचय और साक्ष्य है। गोंडी भाषा में गोंडवाना का इतिहास छुपा है। अगर गोंडवाना के इतिहास को जानना होगा तो गोंडी भाषा को सीखना भी अनिवार्य है। इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए और गोंडी संस्कृति को बचाये रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को गोंडी भाषा सीखना अनिवार्य है। गोंडी भाषा दर्पण मासिक पत्रिका का उद्देश्य गोंडी भाषा को जन-जन तक पहुंचाना है। 



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चुडुर मन तकलीफ सियाता


मनतुन बाहुन बने कियाना आहून आयल, चुडूर मन हमेशा तकलीफ सियाता इमाट मनतुन बच्चोर मजबूत कियाना अच्चोर मिकुम अच्छा सर्री दिस्सल अनि पुट्टल इमाट हमेशा मनतुन चुडूर इर्रीतीड़ी सब कुछ पुन्दानिक मिवा जोरे मन मंदा, पुन्दानिक काम कियानिक मिवा जोरे उंडी शक्ति मंदा अद आड़ा त बल ताल इमाट  सजोर सजोर काम कीसे कीड़ मीवा मन छिन मेटे बहके आसाता जब मिवा नेली ते दाना हिल पंडो तो इमाड़ सीधो दैय भूत ता पर्रों शंका  दस्सी सियातीड़ी अनि इंत्तोड़ी की दय भूत ता कारण नेली ते दाना हिल पंडोय अजुन इमाड़ बेहबा ते दाना हिल पंडत ताना रप्पो ते हिल हन्नीड़ मनतुन सीधों भूत अनि प्रेतकाना जोरे अव्वाहचतड़ी मन भूत प्रेत केने लागसता अनि धीरो धीरो कमजोर आसता जब मन कमजोर आसता ते मानवल बीमार आसातोर अनि बत्ती काम हिल किया पर्रोर, दैय भूतकना चक्कर ते ओर बर्बाद आसातर तान लाय ईमाड़ मनतून इच्चोर मजबूत कीम्ट मनतुन शक्ति शाली बने कीम्ट मन शक्तिशाली आयाल ते हरचीज कुनु सोचे समझे आयाल अनि सोचे समझे आसीकुन अच्छा काम कियाल जब मन अच्छा मंदाल तो मानवल ता मेन्दोल भी अच्छा मंदाल पराया धन हुरसी इमाड़ ईष्र्या कियातिड़ी अनि लगोत पिज्जा आसीसियातीड़ी सजोर तर्मुक चुडुर तर्मुक न पर्रो ईष्र्या कियातीेर ओन लागीता की नासे चुडूर मंदोर अनि नासे ज्यादा धन माया कमेकियातोर इहून इंजी ओना गली-गली ते निन्दा कियातोर पर ओना मेहनत अनि कर्म तून हिल हुरोर चुडूर तर्मुक न मन काम ते लागता बद मन काम ते लागिता अद मनतून सजोर पेन शक्ति सियाता अनि बद मन दिन मेड़ ईष्र्या किसेके मन्ता अद मनतून सजोर पेन तकलीफ सियाता इमाट मन तून बच्चोर मजबूत केकीड़ अच्चोर मिवा मन मजबूत आयल इम्माड़ मनतून मजबूत किसी सजोर पेन ता बेहतल सर्री ताकसीकून बेस मनाना मीवा मन ते कपट मन तताना मनते कपट वायलते मानवल बहके आसीकून कपटी आसातर इमाड़ बहवा ते गरीब मंदोड़ी इद लंबेज ता चिन्ता मिकुम कियाना है जब तक खुद ता पर्रो चिन्ता हिल कियाना मिवा मन बेस हिल मंदाल ईमाड़ भला बुरातुन समझे आयातीड़ी बद काम ते भला हैया अनि बद कामते बुरा हैयय तेन समझे आयना जरूरत मंदा इमाड़ भला-बुरा हिल समझे आयाकीड़ ती मीवा काम हिल आयल मिकुम धक्का सीसी टोंडसानूर इमाट सिफ अर्से के मन्दाना हूर्राट दुनिया ते ईमाट बाहुन मंत्तोड़ी मीवा मंदाना उद्दीना, तिंदाना दुनियातून दिस्सीता ईमाड़ जरासी पैसा न पिज्जा डैयतीड़  ईमाड़ गरीब आसीतीड़ मीवा मान सम्मान डैय्या लात इमाड़ मनतून ज्ञानी बने कीम्ट मीवा मन ज्ञानी बने आयल ते सर्व शक्ति मान सजोर पेन ता प्रकृति रहस्यतून पुन्दाल प्रकृति ता रहस्य तून पुन्दाना सब मानवल्कना पूयनेम आंद इमाड़ पूयनेम ता सर्रीतल ताकिना मीवा मेन्दोल मंदा अनि इद मेन्दोलता रप्पों मन मंदा तेन इमा ज्ञानी बनेकियानिक भुमकाल ता ढिंगा हंदाना भुमकाल मीवा मन तून इच्चारे मजबूत किसान्दोर की इमाड़ दुनिया मेटा शक्तिनू पुन्दाना अनि  हव्व शक्ति नु पुना नाय इमाट दुनिया मेटे पूयनेम ता काम कियाना इमाट शक्ति वान बने आयनिक गलत सर्री नू पोहताना अनि पूयनेम सर्रीतल ताकिना इमाट लंद फंद वनिकीतर ओना लंबेज कुन जल्दी माने आसातिड़ी अनि वोना सर्रीतल इमाड़ ताकीतिड़ी मीवा मनता मति तून मते किसी कुर्री मीवा धन संपदा तून लूटै किसे लातर अनि मीवा मन जब धोका तिन्ता तब पछेते आयातिड़ी अनि मनतेने रांगीतिड़ी अनि इंतोडी बैरी नाकुन धोका सीती हन निवा नाश आयल इंजी ओना ठठरी उराहची कोसे कियातीड़ी इमाड़ तो ओन कोसे किया तिड़ी पर ओर मिकुम बहके किसी धनवान बने आसीतर मीवा मन चुडूर आसाता अनि इमाड़ जरा सी धन माया ता लोभ ते वासीकुन कुर्री न बसे ते वासातीडि़ इमाट मनतुन मजबूत बने कीम्ट अनि नेड बाहुन तरक्की कियाना है इद बात ते विचार कीम जब तक ईमाड़ विचार हिल कियाना दुनिया ता तरक्क्ी तल पिज्जा आसाना नेड इमाड़ मन तून लगोत फड़ा बने किसी मनते बड़े-बड़े विचार तराट अनि फड़ा -फड़ा विचार मिवा मन ते हिल वायल ते इमाड़ तरक्की हिल कियापर्रीकिड़ नेड, ठेला, मोटर, हवाई जहाज, मोबाईल, इन्टरनेट, वड़े ढेर सारे दुनिया ते बने आयता दुनिया मेटे फैक्ट्री , कंम्पनी ताकिता अनिमिवा नाय सुख सुविधा ता हर चीज बनेकियाता अनि इमाड़ हैयेते भूत प्रेत कना सोधे डायनकना  चक्कर ते मन्दतोड़ी इमाड़ पूयनेम ता सर्री पोहची भूतप्रेत शोधे डायनकेने मनतून लागचाहसीतिड़ी तानसे मीवा तरक्की हिल आयो मन तून चुडूर किसातिड़ी मिवा भाई तरक्की कियातोर और बाहुन तरक्क्ी कियातर ओना तरक्कीता सर्रीतून हुर्दीसी इमाड़ भी तरक्की कीमट इमाड़ ईष्र्या मन कियाना मिवा तरक्की ते भूत-प्रेत आत्मा बाधा हिल कियानू वश इमाट मनतू ता शक्ति तून मजबूत कीम्ट बद हिना मिवा मन मजबूत आयलअद दिना भूत-प्रेत-शोधे डायन सब डैयसनू इमाड़  काम कीम्ट मन ते अच्छा-बुरा सब बात मंता बद समय ते बाडुन वन्किना बाहुन व्यवहार कियाना इव्व सब वात मन ते सोचे कियाना है रोन-रच्चा तून बने बाहुन सजे कियाना मीवा पर्रो मंदा इमाड़ जीवन ते अच्छा तिन्दाना अनि मंदाना ता हुनर हिल कर्रीताना तो मिवा जिन्दगी नरकमय आसता अनि इमाड़ परेशान आसी इगा आगा वलितातीडि़, मिकुम बग्गाने तरक्कीता सर्री हिल दिस्सो इमाड़ फिर मनतून चुडूर किसी सियातोड़ी ।.............................संकलन संवाददाता गोंडी भाषा दर्पण

darbu singh uikey 
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