

गोंडवाना साम्राज्य गढ़ा जबलपुर भारत में पैर परसाने वाले अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने की पूरी योजना बना ली गई और राज महल से सभी सैनिकों को गुप्त तामीली दी गई कि 52 गढ़ गोंडवाना साम्राज्य भारत भूमि से अंग्रेजी ताकत को नस्तानबूत करना है। पूरी ताकत के साथ लड़ाई होगी अंग्रेजों को गोंडवाना के वीर सपूतों की ताकत को दिखाना अब अनिवार्य हो गया है। बावनगढ़ गोंडवाना साम्राज्य के अंतिम शासक महाराजा शंकरशाह मरावी ने अपने पुत्र युवराज रघुनाथशाह मरावी को उक्त संदेश दिया और युवराज रघुनाथशाह मरावी से कहा कि कपटी अंग्रेज हमारे भारत भूमि में व्यापार करने के उद्देश्य से आये और देश की बागडोर अपने हाथ में लेकर धर्म संस्कृति को नष्ट कर ईसाई मिशनरियों में जबरदस्त शामिल कर रहे है। देश, धर्म पर हमला हो रहा है। भारत इस अन्याय को अब बर्दाश्त नहीं करेगा। यह युद्ध हमारे लिये महत्वपूर्ण है। इस युद्ध में हम मर भी जाये तो हमें गर्व होगा, हम अपने देश मातृभूमि की रक्षा में समर्पित है। हमारे प्राण हमारे देश की सुरक्षा में काम आये, हम भारत की रक्षा में हर कदम आगे रहेंगे। पिता की बात को सुनकर युवराज रघुनाथशाह मरावी गद-गद हो गये और अपने राज्य के सैनिकों को बुलाकर कहा कि हमें महाराज ने हुक्म दिया है हम अपने वतन भारतभूमि के सुरक्षा के लिए तैयार हो जाये। अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेडऩा हमारा परम कर्तव्य और धर्म है। अंग्रेज व्यापारी नहीं अंग्रेजी कोई कंपनी नहीं बल्कि ये भोले-भाले गरीब लोगों को लोभ देकर पादरियों के माध्यम से इसाई बना रहे है। भारत की सम्पत्ति को लूट कर विदेशों में जमा कर रहे है और समृद्धशाली संस्कृति के लिए अंग्रेजों के विरूद्ध में नारे लगाये और कहा अंग्रेजों भारत से वापस जाओ इसी में भला है, वर्ना हम तुम्हे मसल देंगे हम भारत के लाल है। सेवा-जौहार, सेवा जौहार।। राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह मरावी भारत स्वतंत्रता संग्रेाम के लिए महासंग्राम की शुरूआत किया। इतिहास के पन्नें में इन शहीदों का नाम का जिक्र नहीं है। इतिहासकार लेखक शायद इतिहास के पन्नों में इनका वर्णन नहीं किया हो एक अलग बात है वैसे भी गोंडवाना संस्कृति और इतिहास को कौन लिखता है जो गोंडवाना का इतिहास लिखता था उसे मार दिया जाता था और उसके द्वारा रचित साहित्य को भी जला दिये जाते थे। गोंडवाना साम्राज्य के कहानी, लेख इतिहास के पन्नों में नहीं पर उसके किला महल धरोहर साक्षी बतौर सिर उंचा किये खड़े है। अपने-अपने वंशजों रखवालों की बाट जोह रहे हो प्रतीत होता है। बहरहाल खोज का विषय है। गोंडी शब्द में अनेक राजाओं का कहानी किस्से सुनाई देती है और वही कहानियों को आधार मानकर किलो महलों को साक्षी मानकर गोंडो की बाहुल्य संख्या को प्रतिपादित कर सच का आईना इतिहासकारों के सामने रखा जा रहा है। जिससे अतीत का वैभवशाली गोंडवाना साम्राज्य को इतिहास के पन्नों में स्थान मिल सके और गोंडवाना साम्राज्य की कहानी वर्तमान में आध्ुाुनिक युग में जीवन बसर करने वाले लोगों को जानकारी हासिल हो सके। इस देश का मूल निवासी समाज बहुत दयालु है। इस बात को आर्यो ने भली भॉंती समझा और उनकी ईमानदारी को पैरों तले रौंदा जिससे आज अपनी पहचान खोने जा रहे गोंड समुदाय के लोग अपनी जाति को सरकार को बताने के लिए अब 50 साल का रिकार्ड साक्षी बतौर प्रस्तुत कर रहे है। जाति, धर्म से उपर उठकर देशहित में अपने प्राण त्यागने वाले शहीदों को अगर यह बात पता चलता कि जिस भारत भूमि को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिए प्राणों की बलि दी और आज उन्हीं के वंशज अपने जाति को बताने के लिए 50 साल का रिकार्ड प्रस्तुत करना पड़ रहा है। आखिर इतना भेदभाव क्यों ? आज स्वतंत्र भारत में उंच-नीच, वर्ण-भेद भले बरकरार हो जो लोग इन कुरूतियों को गरीब भोले-भाले किसान मजदूरों के उपर थोप रहे है। कभी न कभी इसका गंभीर परिणाम भुगतेंगे, उंचनीच भेदभाव वर्ण व्यवस्था, धर्म व्यवस्था, मानव जीवन के लिये घातक है, जिस प्रेमभाव और इंसानियत के लिये बदनियत, हैवानियत दोगले अंग्रेजों के विरूद्ध महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह मरावी ने 1857 की भारत स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हो गये उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि भारत से अंग्रेजों के चले जाने के बाद मूल निवासियों पर जुल्म होगा। आज राजा शंकरशाह मरावी, रघुनाथशाह का बलिदान इतिहास के पन्नों पर स्थान नहीं मिला इसे दुर्भाग्य ही कहा जाये। आज हम उनकी शहादत को याद कर रहे है, आज उनके बलिदान को गौरवशाली इतिहास बनाने के लिये आगे आ रहे है, आज किसी एकलव्य का अंगूठा फिर से नहीं कटेगा। लेखनी लिखने वालों को किसी तोप से नहीं उड़ाया जायेगा। कलम की शक्तिपुंज से शहीदों की शहादत की लेखनी हमेशा अमरकृति होगी जो जनमानस के ह्दय में हमेशा-हमेशा के लिये विराजमान होगा। 18 सितम्बर 1857 वह दिन हमारे लिये दुर्भाग्य का दिन था जब अंग्रेज हंस रहे थे। भारतवासी फूट-फूट कर रो रहे थे। 52 वीं रेजीमेंट के सैनिकों में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी थी। महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जंग का ऐलान हुआ। नाकाबंदी, घेराबंदी अंग्रेजों के आने-जाने के सभी रास्तों पर सैनिकों की तैनाती का गोपनीय बातें अंग्रेजों तक पहुंच गई। अंग्रेजी अपनी आधुनिक हत्यारों से राजा के सैनिकों पर हमला बोल दिया। युद्ध हुआ, अंग्रेजों ने महाराजा शंकरशाह औश्र कुंवर रघुनाथ को घेर लिया फिर भी कई दिनों तक दोनों पितापुत्र को नहीं पकड़ पा रहे थे। घने जंगल पुरवा गांव में राजा अपने बेटे के साथ अंग्रेजों को मारने की योजना बनाने लगे। राजा पुरवा में है सूचना डिप्टी कमिश्रर क्लार्क को मिली। अंग्रेजी सैनिक क्लार्क को यह संदेश किया कि महाराजा शंकरशाह बहुत शक्तिशाली है। इसे जिन्दा पकडऩा बड़ी मुश्किल है। डिप्टी कमिश्रर क्लार्क ने दो दर्जन से ज्यादा सवारी और भारी मात्रा में पुलिस के सिपाहियों को लेकर 14 सितम्बर 1857 को महाराजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथशाह मरावी को गिरफ्तार करने पुरवा पहुंचे। भारी मात्रा में सिपाही पुरवा ग्राम को आसपास से घेर लिया। डिप्टी कमिश्रर ने राजा शंकरशाह को कहा कि हम आपसे युद्ध करने नहीं बल्कि समझौता करने आये है आप हम एक साथ बैठकर चर्चा करेंगे। आपके राज्य में हम दखल नहीं देंगे। राजा ने अंग्रेज की चिकनी-चुपड़ी बात पर विश्वास कर लिया। शंकरशाह एवं रघुनाथशाह मरावी एवं 13 साथियों ने जैसे ही डिप्टी कमिश्रर के पास पहुंचे तब धोखे से उनके सिपाहियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सिपाहियों ने राजा के निवास की तलाशी ली। उन्हें क्रांति संगठन के संबंध में कई दस्तावेज मिले। उन दस्तावेजों में शंकरशाह द्वारा लिखित एक कविता भी लगी जो राजा ने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने तथा अपना राज्य स्थापित करने के लिए अपनी आराध्य देवी को संबोधित कर लिखी थी। वह कविता थी -

मूंद मुख डंडिन को चुगलौं को चबाई खाइ,
खूंद दौड़ दुष्टन को शत्रु-संहारिका।
मार अंगरेज, रेज, कर देई मात चंडी ।
बचे नहिं बैरि, बाल बच्चे संघरिका ।।
संकट की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर,
दीन की सुन आय मात कालिका।
खायइ लेइ मलेछन को, झैल नहिं करौ अब,
भच्छन कर तत्छन धौर मात कालिका ।।
इसी तरह की कविता उनके बेटे रघुनाथशाह की हस्तलिपि में थी। दोनों को सैनिक जेल में रखा गया। राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह की गिरफ्तारी से 52 वीं रेजीमेंट के सैनिकों में आक्रोश बढ़ गया। उन्होंने राजा को जेल से मुक्त कराने का पूर्ण प्रयास किया परंतु वे सफल न हो सके। अंग्रेज जानते थे कि शहरशाह की आजादी क्रांतिकारियों को एकत्र कर देगी। इसलिए उन्होंने तत्काल डिप्टी कमिशनर और दो ब्रिटिश अधिकारियों की एक सैनिक अदालत बैठाई। अंग्रेजों की सैनिक अदालत का न्याय एक नाटक था। अदालत ने भीषण देशद्रोह रूपी कविता लिखने और कार्य करने के अपराध में राजा और उनके पुत्र को मृत्युदण्ड की सजा सुना दी। विश्व के इतिहास में साहित्य सृजन पर ऐसा अमानवीय अत्याचार कम ही देखने में आता है। 18 सितम्बर 1857 को जबलपुर में एजेंसी हाउस के सामने फांसी परेड हुई। एजेंसी हाउस के अहाते में दो तोपें लाई गई। इसक ेबाद राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह को जेल से लाया गया। उनके चेहरों में दृढ़ता झलक रही थी। राजा को देखने के लिए अपार जनसमूह का सैलाब उमड़ पड़ा। सैनिक उत्तेजित भीड़ को संयमित कर रहे थे। शंकरशाह तथा रघुनाथशाह की हथकडिय़ां और बेडिय़ां निकाल कर उन्हें तोप के मुंह पर बांध दिया गया। तोप के मुंह पर बांधे जाने के समय शंकरशाह ने प्रार्थना की कि देवी उसके बच्चों की रक्षा करें जिससे कि वे अंग्रेजों से बदला ले सकें। शीघ्र ही तोपचियों को तोप दागने की अज्ञा दी गई। तोप चलाते ही पिता-पुत्र के अंग क्षत-विक्षत होकर चारों ओर बिखर गये।
घटनास्थल पर उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी ने इस घटना का वृतांत दिया - वृद्ध का चेहरा शांत और दृढ़ था (इसके पूर्व भी वह अचल रहा) इसी तरह का भाव उसके 40 वर्षीय पुत्र के चेहरे पर भी था। उनके पैर और हाथ तोपों के निकट ही गिरे- क्योंकि वे बंधे हुए थे। सिर और शरीर के उपरी भाग सामने की ओर 50 फुट की दूरी तक बिखर गये। उनके चेहरों को जरा भी क्षति नहीं पहुंची थी। उनकी गरिमा अक्षुण्ण रही।
रानी ने अधजले अवशेष एकत्र कर उनके अंतिम संस्कार विधिवत पूर्ण किये। अंग्रेज शंकरशाह-रघुनाथशाह की तोप से उड़ा क्रांति की की चिंगारी बुझाना चाहते थे। लेकिन वह चिंगारी बुझी नहीं और धधक उठी। 52 वीं रेजीमेंट के सैनिक उसी रात क्रांति की राह पर चल पड़े। इस तरह शंकरशाह ने गढ़ा-मंडला की गौरवशाली बलिदानी परंपरा में एक और अध्याय जोड़ दिया। लगभग 300 वर्ष पूर्व गोंड वंश की वीरांगना ने भी मुगल साम्राज्य के विरूद्ध हथियार उठाया था। गोंड की स्वाधीनता की रक्षा के लिये रानी दुर्गावती ने रणभूमि में प्राण न्यौछावर किये थे। उनके वंशजों ने भी उसी बलिदानी परंपरा का निर्वाह किया।
आज पूरे देशवासियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बनकर रह गये है। एक ओर जहां इनकी शहादत को प्रतिवर्ष याद किया जाता है वहीं सरकार की ओर से इन शहीदों का नाम इतिहास के पन्नों पर ना लाकर आदिवासी वर्ग के क्रांतिकारियों के नाम को शायद इतिहास के पन्नों से मिटा देने की मंशा रही होगी। यह साफ स्पष्ट है कि भारत स्वतंत्रता संग्राम के जनक आदिवासियों को ही कहा जाता है और शुरूआत भी आदिवासियों ने ही किया था। बाहरी ताकतों का विरोध करने में और हथियारों से लडऩे में माहिर क्रांतिकारियों का नाम और उनके द्वारा किए गए देशहित के कार्यो का इतिहास के पन्नों पर ढूंढने पर भी नहीं मिलता है। आज गोंडवाना समुदाय के लोगों को खुद के इतिहास को खुद को लिखना होगा और जो गोंडवाना की आन, बान, सम्मान के लिए शहीद हो गये उनकी शहादत व्यर्थ न जाय इसके लिए हर दिन हर वर्ष उनकी कुर्बानी को याद का देश निर्माण में लगा देना चाहिए। इसी प्रकार बहुत से वीर महापुरूष हुए जिनका नाम सरकार ने कभी इतिहास के पन्नों में लाने की कोशिश नहीं की। वे इस प्रकार है - 1765 - छोटानागपुर में संथाल परगना का ब्रिटिश राज में अधिग्रहण
1772-80 - पहाडिय़ा विद्रोह
1780-85 - तिलका माँझी के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना से
सफल मुकाबला
1785 - तिलका माँझी को तमाड़ विद्रोह के सिलसिले में भागलपुर
कारागार में फाँसी की सजा
1795-1800 - तमाड़ विद्रोह
1797 - विष्णु मानकी के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह
1798 - वीरभूम बाँकुड़ा में मानभूम का चौर विद्रोह
1798-99 - मानभूम का भूमिज विद्रोह
1800-02 - तमाड़ के दुखन मानकी के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह
1819-20 - भूकन सिंह के नेतृत्व में पलामू में मुंडा विद्रोह
1832-33 - खेरवाड़ विद्रोह
1833-34 - वीरभूम के गंगानारायण सिंह के नेतृत्व में भूमिज विद्रोह
1855 - लॉर्ड कार्नवालिस के खिलाफ़ संथाल विद्रोह
1855-60 - सिद्धू कान्हू विद्रोह
1874-99 - बिरसा मुंडा का आंदोलन
1874 - भागीरथ माँझी का खैरवाड़ विद्रोह
1912 - बिहार का विभाजन छोटानागपुर का बंगाल में विलय
1913 - छोटानागपुर उन्नति समाज का गठन
1914 - तानाभगत का आंदोलन
darbusingh uikey
edtior
gondi bhasha darpan
balaghat (m.p) india
I want these pictures
ReplyDeleteहम गोंड है मगर हमारा भाषा हैं नहीं जानते
ReplyDeleteआज कल हमारे भाषा को जाना जरूरी है
जय सेवा जय गोंडवाना